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Showing posts from December, 2019

उनचास मरुत का क्या अर्थ है ? | वायु कितने प्रकार की होती है?

Unchaas Marut | उनचास मरुत तुलसीदास ने सुन्दर कांड में, जब हनुमान जी ने लंका मे आग लगाई थी, उस प्रसंग पर लिखा है -* *हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।* *अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास।।25।।* अर्थात : जब हनुमान जी ने लंका को अग्नि के हवाले कर दिया तो -- *भगवान की प्रेरणा से उनपचासों पवन चलने लगे।* *हनुमान जी अट्टहास करके गर्जे और आकार बढ़ाकर आकाश से जा लगे। 49 प्रकार की वायु के बारे में जानकारी और अध्ययन करने पर सनातन धर्म पर अत्यंत गर्व हुआ। तुलसीदासजी के वायु ज्ञान पर सुखद आश्चर्य हुआ, जिससे शायद आधुनिक मौसम विज्ञान भी अनभिज्ञ है । आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि *वेदों में वायु की 7 शाखाओं के बारे में विस्तार से वर्णन मिलता है*। अधिकतर लोग यही समझते हैं कि वायु तो एक ही प्रकार की होती है, लेकिन उसका रूप बदलता रहता है, जैसे कि ठंडी वायु, गर्म वायु और समान वायु, लेकिन ऐसा नहीं है।  दरअसल, जल के भीतर जो वायु है उसका वेद-पुराणों में अलग नाम दिया गया है और आकाश में स्थित जो वायु है उसका नाम अलग है। अंतरिक्ष में जो वायु है उसका नाम अलग और पाताल में स्थित वायु का नाम अलग है। नाम अल

परिवर्तन का सिद्धान्त | Parivartan Ka Siddhant

परिवर्तन का सिद्धान्त  |  Parivartan Ka Siddhant भगवान् श्री कृष्ण ने भागवत गीता में स्पष्ट रूप से बोला की परिवर्तन संसार का नियम है अर्थात जो आज है वो कल नहीं होगा और जो कल होगा वो परसो नहीं होगा। हर पल को पूर्ण जागृत अवस्था में जीने का नाम जीवन है। आने वाला कल अनिश्चित है पर आने वाला अग्ला पल हमारे हाथो में है और अगर हम चाहे तो आने वाले अगले पल को पूर्णरूप से जी कर अपने भविष्य के लिए सुनहरे सपने बो सकते है।  इस संसार में हर प्राणी में भगवान् का निवास है और हर आत्मा भगवान् के होने की सूचक है क्योंकि बिना उस अदृश्य शक्ति के संसार का स्वतः चलना असंभव था। प्राणी के जन्म से लेकर उसके मरण तक हर क्षण कोई ना कोई परिवर्तन उसके जीवन में होता रहता है । परिवर्तन के सिद्धान्त को स्वीकार करना प्रत्येक प्राणी का कर्तव्य होता है। मनुष्य का मानवीय स्वभाव होता है कि हम उन परिवर्तनों को स्वीकार कर लेते है जो मनुष्य के अनुकूल होते है पर जो परिवर्तन प्रतिकूल होते है उन्हें हम स्वीकार नहीं कर पाते। जबकी वेदांत ज्ञान कहता है कि मनुष्य को तटस्थ रहना चाहिए अर्थात समभाव में रहना चाहिए क्योंकि जो मनुष