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Showing posts from October, 2019

उनचास मरुत का क्या अर्थ है ? | वायु कितने प्रकार की होती है?

Unchaas Marut | उनचास मरुत तुलसीदास ने सुन्दर कांड में, जब हनुमान जी ने लंका मे आग लगाई थी, उस प्रसंग पर लिखा है -* *हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।* *अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास।।25।।* अर्थात : जब हनुमान जी ने लंका को अग्नि के हवाले कर दिया तो -- *भगवान की प्रेरणा से उनपचासों पवन चलने लगे।* *हनुमान जी अट्टहास करके गर्जे और आकार बढ़ाकर आकाश से जा लगे। 49 प्रकार की वायु के बारे में जानकारी और अध्ययन करने पर सनातन धर्म पर अत्यंत गर्व हुआ। तुलसीदासजी के वायु ज्ञान पर सुखद आश्चर्य हुआ, जिससे शायद आधुनिक मौसम विज्ञान भी अनभिज्ञ है । आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि *वेदों में वायु की 7 शाखाओं के बारे में विस्तार से वर्णन मिलता है*। अधिकतर लोग यही समझते हैं कि वायु तो एक ही प्रकार की होती है, लेकिन उसका रूप बदलता रहता है, जैसे कि ठंडी वायु, गर्म वायु और समान वायु, लेकिन ऐसा नहीं है।  दरअसल, जल के भीतर जो वायु है उसका वेद-पुराणों में अलग नाम दिया गया है और आकाश में स्थित जो वायु है उसका नाम अलग है। अंतरिक्ष में जो वायु है उसका नाम अलग और पाताल में स्थित वायु का नाम अलग है। नाम अल

Swami Parmanand Giri Ji Maharaj- Motivational Speech- Part 9

प्रिय भागवत प्रेमियों हम सभी अपने जीवन में किसी न किसी समस्या से परेशान है और उस समस्या का समाधान पाने के लिए हम सभी को गुरु की शरण लेनी पड़ती है। परम श्रद्धेय महामंडलेश्वर स्वामी श्री परमानंद गिरी जी महाराज के मुखारविंद से आप सभी को वेदांत वचन के नवे पुष्प को हम सुनने जा रहे है ।  आप सभी से आशा है और पूर्ण विश्वास भी है कि महाराज श्री की परम वाणी को आप सभी अपने हृदय में धारण कर अपने जीवन को कृतार्थ करेंगे। परमानंद जी महाराज अपने बाल्यकाल से आज तक निरंतर जन मानस को जागृत कर आध्यात्म की ओर अग्रसर करने का निरंतर प्रयास कर रहे है अतः अब हम सभी को उनके इस पुनीत कार्य में उनका सहयोग देते हुवे अपने मन मस्तिषक में सनातन धर्म की परंपरा और ज्ञान को स्थान देना होगा। Swami Parmanand Giri Ji Maharaj- Motivational Speech- Part 9

गुरु कृपा सागर - स्वामी परमानंद जी महाराज

गुरु कृपा गुरु की कृपा और उनकी महिमा का वर्णन पुरातन काल से हमारे वेद और शास्त्रों में अनेकों जगहों वर्णित है। गुरु की महिमा का सहज वर्णन नहीं किया जा सकता।  सहजोबाई एक साध्वी ने तो यहां तक कह डाला कि "गुरु न तजौ ,हरी हो ताज डारौ " अर्थात गुरु को मैं नहीं छोड़ सकती भले ही हरि को छोड़ना पड़े। इसीलिए गुरु को कृपा का सागर अर्थ गुरु कृपा सागर कहते है।  गुरु को मैं नहीं छोड़ सकता हरी को छोड़ सकता हूं क्योंकि हरी सदा साथ रहा और उसने मेरा कोई भी काम नहीं किया। हरि तो सदा से था। वह करता पुरुष ,अकाल पुरुष ,परमपिता तो सदा से था परंतु उसने हमारा क्या किया। इसलिए कहा गया है "हरी ने जन्म मरण दियो साथ "  अर्थात हरि ने तो जन्म और मरण दिया ,हरि के कारण ही सारा बंधन और दुख हुआ ,जो भोगना पड़ा परंतु गुरु ने कृपा करके मुझे छुड़ा लिया ,बंधन मुक्त कर दिया ,गुरु ने भाव बंधन से छुटकारा दिलाया और मेरे स्वरूप का बोध कराया। गुरु का काम बंधन मुक्त करना है।  गुरु की महिमा का गान करते हुए अन्य गुरुवो ने भी कहा "गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पाय बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताए"

योग में सहजता और सरलता - स्वामी परमानन्द गिरी जी महाराज

प्राय देखा गया है की बहुत से साधक योग साधना के द्वारा अपनी कुण्डलिनी शक्ति को जागृत करने का प्रयास करते है पर कुछ त्रुटियों के कारण सफल नहीं हो पाते। स्वामी परमानन्द जी महाराज द्वारा बताये गए योग के सिद्ध्हांतो में से कुछ विशेष सिद्धांत यहाँ बताये गए है जिनका  को ज्ञान होना चाहिए।  योग साधना करते हुए साधक को चाहिए कि वह अपने शरीर को सहज स्थिति में रहने दे अर्थात शरीर को जैसी स्थिति अच्छी लगती है ,शरीर स्वाभाविक जैसे अच्छा अनुभव करता है साधक को उसी आसान में बैठना चाहिए लेकिन सहजता का अर्थ यह नहीं की योग करते समय आप निंद्रा की अवस्था में हो जाएं। आपको सतत स्मरण रहे ,आप क्षण प्रतिक्षण जागृत रहे अर्थात आप पूर्ण जागृत अवस्था में रहे।   इस बात का ध्यान रखना चाहिए की जब कुंडलिनी शक्ति जागृत होती है तो शरीर में विभिन्न प्रकार की क्रियाएं होने लगती हैं। भीतर जो होता है उसे सहजता से होने दे। उसमें आपकी समझ व संकोच बाधक नहीं होनी चाहिए। साधक सरल हृदय होना चाहिए। जिनका हृदय सरल होता है वह गुरु के पास बैठभर जाते हैं तो उनकी कुंडलिनी जागरण हो जाती है। ऐसा साधकअपने गुरु के उपदेश को ग्रहण करने

परमानन्द जी महाराज का जीवन परिचय

परमानन्द जी महाराज का जीवन परिचय  स्वामी परमानंद जी महाराज सनातन धर्म और वेदांत वचनों और शास्त्रों के विश्वविख्यात ज्ञाता के रूप में आज संसार के प्रसिद्ध संतों में गिने जाते हैं। स्वामी परमानंद गिरि जी महाराज ने वेदांत वचन को एक सरल और साधारण भाषा के अंदर परिवर्तित कर जनमानस तक पहुंचाने का संकल्प लिया आज उस संकल्प को पूर्ण होता हम सभी अपनी आंखों से देख सकते हैं।  महाराज श्री के जीवन के विषय में कहें तो महाराज श्री बाल्यकाल से ही आध्यात्मिक जगत की ओर अग्रसर रहें। परमानन्द जी महाराज का जन्म 30 के दशक के उत्तरार्ध में 26 October 1935 को फतेहपुर ,उत्तर प्रदेश में हुआ। बचपन से ही उनमें कई असाधारण विशेषताएं दिखाई पड़ने लगी तत्पश्चात चित्रकूट के महान संत श्री स्वामी अखंडानंद जी महाराज ने जो की मध्य प्रदेश के निवासी थे उन्होंने उस बालक के दिव्य गुणों को पहचान कर उसे अपने शिष्य के रूप में स्वीकार किया।  अपने गुरु के मार्गदर्शन व प्राचीन शास्त्रों में पारंगत होने के साथ-साथ आप एक हर्बलिस्ट और योग ध्यान के स्वामी बन गए। अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने सन्यास का संकल्प लिया और एक कर्म