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Showing posts from January, 2018

उनचास मरुत का क्या अर्थ है ? | वायु कितने प्रकार की होती है?

Unchaas Marut | उनचास मरुत तुलसीदास ने सुन्दर कांड में, जब हनुमान जी ने लंका मे आग लगाई थी, उस प्रसंग पर लिखा है -* *हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।* *अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास।।25।।* अर्थात : जब हनुमान जी ने लंका को अग्नि के हवाले कर दिया तो -- *भगवान की प्रेरणा से उनपचासों पवन चलने लगे।* *हनुमान जी अट्टहास करके गर्जे और आकार बढ़ाकर आकाश से जा लगे। 49 प्रकार की वायु के बारे में जानकारी और अध्ययन करने पर सनातन धर्म पर अत्यंत गर्व हुआ। तुलसीदासजी के वायु ज्ञान पर सुखद आश्चर्य हुआ, जिससे शायद आधुनिक मौसम विज्ञान भी अनभिज्ञ है । आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि *वेदों में वायु की 7 शाखाओं के बारे में विस्तार से वर्णन मिलता है*। अधिकतर लोग यही समझते हैं कि वायु तो एक ही प्रकार की होती है, लेकिन उसका रूप बदलता रहता है, जैसे कि ठंडी वायु, गर्म वायु और समान वायु, लेकिन ऐसा नहीं है।  दरअसल, जल के भीतर जो वायु है उसका वेद-पुराणों में अलग नाम दिया गया है और आकाश में स्थित जो वायु है उसका नाम अलग है। अंतरिक्ष में जो वायु है उसका नाम अलग और पाताल में स्थित वायु का नाम अलग है। नाम अल

Swami Parmanand Giri Ji Maharaj- Motivational Speech- Part 6

        Swami Parmanand Giri Ji Maharaj     युगपुरुष स्वामी परमानन्द गिरी जी महाराज   प्रिय भक्तो आज  परम  पूजनीय श्री परमानन्द जी महाराज के बहराइच समागम की कथा का प्रथम भाग सुनाने जा रहे है।  हमे पूर्ण आशा है की आप सब प्रेमी महाराज श्री के मुखारबिंद से ज्ञान वर्षा के मधुर शब्दों में भीग के अपने अपने जीवन को सफल बनाएंगे और अपने ईस्ट मित्रो के साथ महाराज जी के इस पवन प्रवचन को जरूर शेयर करेंगे। स्वामी जी का एक मात्र उद्देश्य सामाजिक कल्याण करते हुवे मानव मात्र को सही दिशा प्रदान करना है। महाराज श्री के अनमोल वचनो की धारा  हम सब भक्तो पे यूही बरसती रहे बस इसी का प्रयास किया जा रहा है। हम सब अपनी अंतर आत्मा से युग पुरुष स्वामी जी श्री परमानन्द गिरी जी महाराज का स्वागत और सत्कार करते है की उन्होंने हम दीन बंधुओ पर अपनी कृपा द्रिष्टी डाली और हमे सत्मार्ग दिखाने का बेडा उठाया।  जय हो गुरुदेव जी महाराज की।  श्री राम जय राम जय जय राम  श्री राम जय राम जय जय राम  "गुरूर्बह्रमा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरा |   गुरुर्साक्षात परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः || "